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आदियोगी: योग के स्रोत

आदियोगी: योग के स्रोत

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शुरुआत: आदि योगी, एक अंश

पंद्रह हज़ार साल पहले, हिमालय की ऊँचाइयों में, जहाँ साल भर बर्फ़ रहती है और आकाश धरती के समान है, एक पुरुष प्रकट हुआ।

वह ऐसा पुरुष था जैसा पहले कभी किसी ने नहीं देखा था – नौ फीट लंबा, भस्म से सना हुआ, लंबे जटाओं वाला। कभी-कभी वह पूरी तरह स्थिर बैठ जाता। कभी-कभी वह नाचता। उसका नृत्य अवर्णनीय था। उन्मत्त और परमानंदमय, ऐसा लगता मानो वह पूरे ब्रह्मांड में उल्लास का संचार कर रहा हो। उसके चारों ओर ग्रह और तारे, नदियाँ और वन, पर्वत और समुद्र जीवन से भर उठे। जब वह अचल रहता, तो ऐसा लगता मानो वह समस्त सृष्टि के हृदय में स्थित कालातीत मौन बन गया हो। ऐसा लगता मानो वह स्वयं जीवन बन गया हो।

पहले किसी ने उसके जैसा किसी को नहीं देखा था। वे नहीं जानते थे कि वह कौन है, कहाँ से आया है, उसकी उत्पत्ति क्या है। उसके चारों ओर भारी संख्या में लोग जमा हो गए, क्योंकि उसकी उपस्थिति अत्यंत असाधारण थी। यह स्पष्ट था कि यद्यपि वह इस ग्रह पर था, पर इस ग्रह का नहीं था। वे प्रतीक्षा करते रहे, किसी चमत्कार की आशा में। कुछ नहीं हुआ।

अधिकांश समय वह बस स्थिर बैठा रहता, अपने चारों ओर हो रही बातों से पूरी तरह बेखबर। उसके नेत्रों से आनंद के कुछ आँसू गिरने के अलावा, उसमें जीवन का कोई संकेत नहीं दिखता था। हर किसी की आँखों के सामने एक महान चमत्कार हो रहा था, पर वे उसे पूरी तरह देख नहीं पाए। वे यह नहीं समझ सके कि उसका दिन-रात, हफ्तों-महीनों तक स्थिर बैठे रहना ही असली चमत्कार था। वे आतिशबाजी की उम्मीद कर रहे थे। ऐसा कुछ नहीं हुआ। सब चले गए।

केवल सात पुरुष वहीं रुके रहे। वे जा नहीं सके। यह रहस्यमयी पुरुष अब केवल उनके संसार का केंद्र नहीं रह गया था। वह पूरे ब्रह्मांड का मूल, अस्तित्व के समस्त रहस्यों की कुंजी जैसा प्रतीत होता था। जब उसने अंततः अपनी आँखें खोलीं, तो उन्होंने उससे प्रार्थना की कि वह अपना अनुभव उनके साथ साझा करे। उसने उन्हें टाल दिया।

उसने कहा, ‘यह मनोरंजन चाहने वालों के लिए नहीं है। चले जाओ।’

पर वे डटे रहे।

कई लंबे वर्षों के बाद, उनकी अडिग निष्ठा और प्रदीप्त ग्रहणशीलता को अनदेखा न कर पाने के कारण आदि योगी – या प्रथम योगी, जैसा कि इस पुरुष को कहा जाने लगा था – ने उन्हें स्वीकार कर लिया। उसने इन सात प्यासे साधकों पर ध्यान केंद्रित किया और उन्हें जीवन की प्रकृति का उपदेश देना शुरू किया।

उसी पूर्णिमा के दिन – ग्रीष्म संक्रांति के बाद पहली पूर्णिमा पर – इस ग्रह पर जीवन की कार्यप्रणाली का संपूर्ण अन्वेषण प्रकट हुआ। उसी दिन आदि योगी आदि गुरु, प्रथम गुरु बने। भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास में उस दिन को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है।

यह दिन इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

इसी दिन मानव चेतना में मुक्ति का बीज बोया गया था। इसी दिन मानव इतिहास में पहली बार यह घोषित किया गया कि जीवविज्ञान नियति नहीं है और यह संभव है कि मनुष्य सचेत रूप से विकसित हो। सीमित, असीम बन सकता है। विशेष, सार्वभौमिक बन सकता है। बाध्यता, चेतना में बदल सकती है। सृष्टि के एक अंश के लिए सृष्टि के स्रोत के साथ एक हो जाना संभव है। मनुष्य दिव्य सत्ता बन सकता है।

इस बोध ने आस्था को जन्म नहीं दिया। इसके बजाय इसने विज्ञान को जन्म दिया। एक ऐसा विज्ञान जिसका उद्देश्य मनुष्यों को उनके अपने भाग्य का स्वामी और अपने नियति का शिल्पी बनाना था। गुरु पूर्णिमा धर्म से भी पहले है। यह तब हुआ जब धर्म का विचार भी मानव मन में नहीं आया था। इस यात्रा में किसी पूर्व-निर्धारित निष्कर्षों में विश्वास की आवश्यकता नहीं थी। यह यात्रा अन्वेषण के बारे में थी – मानव चेतना की गहनतम गहराइयों का निडर अन्वेषण। इसका परम लक्ष्य ईश्वर नहीं था। इसका परम लक्ष्य मुक्ति था।

आदि योगी ने उन सात शिष्यों को योग – अर्थात मिलन – के विज्ञान के मूल सिद्धांत प्रदान किए – एक ऐसा क्रांतिकारी आत्म-रूपांतरण का विज्ञान जो उस प्रथम उपदेश के हज़ारों वर्ष बाद भी जीवित है, एक ऐसा विज्ञान जो मनुष्यों को अपनी अंतिम क्षमता तक खिलने के लिए सशक्त बनाना जारी रखता है। लक्ष्य मुक्ति था – शारीरिक दासता और मानसिक संलिप्तता से स्वतंत्रता। लक्ष्य स्वयं जीवन था – गर्जना करता, अबाध जीवन। परमानंदमय, असीम, अनंत जीवन। और आदि योगी ने घोषित किया कि वह स्वतंत्रता हर मनुष्य की पहुँच में है।

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